Login

सामाजिक दूरी का महत्त्व: १९१८ की महामारी से सीख

April 9, 2020 Authored by: admin

लगभग सौ वर्ष पूर्व की यह बात है। प्रथम विश्व युद्ध समाप्ति की ओर था। सन् 1918 के मई माह के अंत में बाम्बे शहर के बंदरगाह पर ब्रिटिश इंडिया की फौज, रसद, और युद्ध का सामान जहाजों पर लदकर वापस लौटा था। बंदरगाह पर सामान और फौजियों को जहाज से उतारने के लिए जबरदस्त चहल-पहल मची हुई थी।

10 जून 1918 को एक जहाज पर ब्रिटिश इंडिया के सात सिपाही भयंकर सर्दी-जुखाम और तेज बुखार से पीड़ित पाये गये थे। यह उस H1N1 इनफ्लुएँजा के लक्षण थे जो ये सिपाही युद्ध की खंदकों से अपने साथ ले आए थे। देखते ही देखते इस बीमारी ने पूरे बाम्बे शहर को अपनी चपेट में ले लिया था। और रेल नेटवर्क के जरिये यह बीमारी महीने भर के अंदर पूरे भारत में फैल गई। क्या अमीर क्या गरीब क्या भारतीय क्या अंग्रेज हर कोई इस बीमारी की चपेट में था।

गोरों में प्रभावितों की संख्या सबसे कम थी। उनकी आबादी भी कम थी, उनके पास रहने के लिए ज्यादा बड़े बड़े हवादार रोशनीदार बंगले थे, चिकित्सा सुविधाएँ भी उन्हें अधिक उपलब्ध थीं, चिकित्सक भी ज्यादातर गोरे ही थे, इसलिए वे कम प्रभावित हुए और ज्यादातर जल्दी ही ठीक भी हो गए। पर उनके ठीक होने में सबसे ज्यादा कारगर उपाय था सामाजिक दूरी जिसे वे ठीक से निभा पाए।

जो अमीर भारतीय थे वे कुछ अधिक प्रभावित हुए क्योंकि उनके पास गोरों की तुलना में कम सुविधाएँ थीं। सामाजिक दूरी का वे भी ठीक से पालन नहीं कर पाए थे। उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी गोरों से कम थी। सबसे बुरी मार पड़ी गरीबों पर और उसमें भी महिलाओं पर ज्यादा। निचली जाति के व्यक्ति बहुत बुरी तरह प्रभावित हुए। उनका पेशा और रहन सहन उन्हें ज्यादा संक्रामकता का शिकार बना रहा था। उस समय भारत के लोग एलोपैथिक चिकित्सा पर कम भरोसा करते थे और तब तक एंटीबायटिक दवाएँ भी उपलब्ध नहीं थीं।

लोगों के लिए एक ही सलाह थी घर में रहो, बाहर मत निकलो, किसी के भी संपर्क से दूर रहो। पर जिनमें इनका पालन सबसे कम हो पाता था वे थे निचली जाति के सेवाकार्य से जीवन यापन करने वाले शूद्र और सभी घरों में पुरुषों, बच्चों और बूढ़ों की तीमारदारी का भार उठाने वाली महिलाएँ। सोशल डिस्टेंसिंग इनके लिए नहीं थी, रोग प्रतिरोधक क्षमता भी इनकी सबसे कम थी क्योंकि न तो इन्हें पूरा आहार मिलता था और न ही वह पौष्टिक एवं ताजा होता था।

इस बीमारी ने भारत में तीन बार पलटा खाया। पहली बार जून से जुलाई, दूसरी बार सितंबर से साल के अंत तक और तीसरी बार अगले साल यानी 1920 के फरवरी से अप्रैल तक। हर बार जैसे ही बीमारी की मार कम होती लोग यह सोचकर की अब सब ठीक हो गया है वापस मेलेठेले, शादी ब्याह, थियेटर, नाटक मंडली, सिनेमा, उत्सव त्यौहार जैसे समूह में होने वाले धार्मिक, सामाजिक कार्यों में जुट जाते और बीमारी दुगने तिगुने जोर से पलटा मारती।

देश में गोरों का राज था, सो उन्हें इस बात की कोई विशेष परवाह नहीं थी कि जन जागरण से या प्रचार प्रसार से लोगों को साफ सफाई का सामाजिक दूरी रखने का संदेश दिया जावे। नतीजा इस बीमारी से, जिसे आज दुनिया स्पेनिश फ्लू के नाम से जानती है, भारत में एक करोड़ अस्सी लाख लोग मारे गये। यह देश की उस वक्त की आबादी का 6% भाग था यानि देश के हर सोलह में से एक व्यक्ति इस रोग का शिकार हुआ।

बीमारी के दूसरे दौर में महात्मा गाँधी भी इस रोग से संक्रमित हुए और उन्होंने गुजरात में साबरमती आश्रम में पथ्य के सहारे रहकर अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता के बल पर स्वयं का उपचार किया। उस वक्त गाँधीजी की आयु पचास वर्ष थी और उन्हें दक्षिण अफ्रीका से लौटे चार वर्ष ही हुए थे। इस रोग ने भारत के प्रसिद्ध कवि श्री सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की पत्नी और परिवार के अनेकों सदस्यों को अपनी चपेट में लेकर असमय मृत्यु का शिकार बनाया। निराला के शब्दों में कि “गंगा में लाशें तैरती नजर आती थीं” मौत के भयानक ताण्डव का दृष्य नजर आता है। मृतकों की संख्या के हिसाब से लकड़ियाँ उपलब्ध ही नहीं थीं इसलिए गंगा समेत देश की कई नदियों में मनुष्यों के शव तैरते नजर आते थे।

रोग के साथ देश ने एक और विभीषिका को भी झेला। उस वर्ष वर्षा लगभग न के बराबर हुई, देश में खाद्यान्न के भंडारण की कोई व्यवस्था नहीं थी इसलिए एक भयंकर अकाल का सामना भी देश ने किया। पहले से ही कुपोषण से पीड़ित देश की आबादी के लिए यह ‘दूबरे और दो अषाढ़’ की स्थिति थी। पर देश के पढ़े लिखे, जागरूक लोगों ने इस विपदा से लड़ने का बीड़ा उठाया। शहर-शहर समीतियाँ बनाई गईं, लोगों में जन जागरण किया गया, बड़ी संख्या में लोगों को जोड़कर स्वच्छता और साफ सफाई की व्यवस्था बनाई गई। रोगी समीतियाँ बनाई गईं, लोगों ने रोगियों की सेवा का जिम्मा लिया। जब अपने ही आगे आए तो लोगों का भी हौसला जगा।

इस रोग और दुर्भिक्ष ने परतंत्र भारत के पहले इतने बड़े और व्यापक सामाजिक आंदोलन को खड़ा किया। और इस आंदोलन से उभरकर बाहर आए अनेकों लोग स्वतंत्रता के आंदोलन में सहभागी हुए। स्पेनिश फ्लू नामक इस रोग ने भारत ही नहीं पूरी दुनिया की एक तिहाई आबादी को संक्रमित किया था और पूरी दुनियाँ में पाँच से दस करोड़ व्यक्ति इस बीमारी की चपेट में आकर मृत्यु का शिकार हुए थे।

सभी जगह कहानी लगभग एक जैसी थी; अस्पतालों और दवाओं की कमी, एंटीबायटिक की अनुपलब्धता , पर्याप्त पोषण न होने से रोग प्रतिरोधक क्षमता न होना और सबके ऊपर लोगों में सामाजिक दायित्व का अभाव। सभी जगह लोग भीड़ से नहीं बच रहे थे, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं कर रहे थे। इन सबकी वजह से कोई डेढ़ साल की अवधि ने इस त्रासदी का इतना भयंकर रूप दिखाया।

साथियो, क्या आज भी वैसी ही कुछ स्थिति नहीं है? नहीं, कदापि नहीं! आज हमारे यहाँ स्वयं की चुनी हुई सरकार है, जो अपने लोगों के प्रति अधिक जबाबदेह है। आज हमारे पास खाद्यान्न का पर्याप्त भंडार है। पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएँ हैं। तुलनात्मक रूप से बेहतर सामाजिक, आर्थिक हालात हैं। स्वच्छता और साफ सफाई के प्रति जन जागरण है। सिर्फ जरूरत है इस नयी परिस्थिति से निपटने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग को अपनाने की। जो मैदान मे रोग से जूझ रहे हैं, लोगों को बचा रहे हैं , उनका हौसला अफजाई करने की। ताली, थाली बजाना या दिया, टार्च जलाना एक टोटका लग सकता है, पर घर में रहकर एकता दिखाने का यह एक कारगर तरीका भी हो सकता है। घर में रहिए, घर में ही रहिए और सोचिए, जरूर सोचिए…..

0 responses on "सामाजिक दूरी का महत्त्व: १९१८ की महामारी से सीख"

Leave a Message

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Centre For Indic studies
X